Ek Akela Is Shehar Mein

एक अकेला इस शहर में,
रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढता है,
आशियाना ढूँढता है

दिन खाली खाली बर्तन है,
और रात है जैसे अंधा कुवां
इन सूनी अंधेरी आखों में,
आँसू की जगह आता है धुंआ
जीने की वजह तो कोई नहीं,
मरने का बहाना ढूँढता है

इन उम्र से लंबी सडकों को,
मंजिल पे पहुचते देखा नहीं
बस दौड़ती, फिरती रहती है,
हम ने तो ठहरते देखा नहीं
इस अजनबी से शहर में,
जाना पहचाना ढूँढता है



Credits
Writer(s): Gulzar, Jaidev
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