Zinda

जानी-बूझी आँखों की जालीदार पलकों में
ख़्वाब जब सरकते हैं, लगता है वो ज़िंदा है
हाँ, लगता है वो ज़िंदा है

शाम की उदासी में एक दीया जलता है
रोशनी जो होती है, लगता है वो ज़िंदा है
वो ज़िंदा है

छू भी लो, वो ज़िंदा है
छू के देखो, ज़िंदा है
छू भी लो, वो ज़िंदा है
छू के देखो, ज़िंदा है

कुछ देर की एक नींद है
सोई नहीं, जाग रही है
एक ख़्वाब तो खोया कहीं
एक ख़्वाब वो माँग रही है

आँख से चाहो तो आज भी छू लो उसे
वो ज़िंदा है

बोलती दलीलों में, काग़ज़ों की स्याही में
हर नई गवाही में, लगता है वो ज़िंदा है
पास जा के देखो तो, थोड़ा-थोड़ा चेहरा वो
आईने में बाक़ी है, लगता है वो ज़िंदा है
वो ज़िंदा है

छू भी लो, वो ज़िंदा है
छू के देखो, ज़िंदा है
छू भी लो, वो ज़िंदा है
छू के देखो, ज़िंदा है



Credits
Writer(s): Gulzar, Vishal Bhardwaj
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