Lagi Karejwa Katar

लागी कलेजवाँ कटार
साँवरिया से नैना हो गये चार ॥

बूँद ना गिरा एक लहू का
कछु ना रही निसानी
मन घायल पर तन पे छायी
मीठी टीस सुहानी
सखी री मैं तो सुध-बुध बैठी बिसार ॥

प्रीत की रीत सखी ना जानू
जीत हुई या हार ना मानू
जियरा करे इकरार अब मोरा ॥



Credits
Writer(s): Pt Jitendra Abhisheki, Purshottam Darvhekar
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